लालच का फल-LALACH KA PHAL

कछुए ने कोए पूछा यह चूहा कौन है ,तुम्हारे लिए सहज आहार बनने वाला यह चूहा तुम्हारे पेट में रहने के वजह तुम्हारी पीठ पर क्यों सवार है वास्तव में तुम इसे क्यों इसे यहाँ तक ढोकर  लाये हो , इसका कोई आसाधारण  कारन होगा।

इस चूहे का नाम हिरण्यक है ,यह मेरा प्रिय मित्र है यह किसी कठिनाई में था ,अब तुम्हारी खोज में आया हुआ है मेरे पूछने पर साफ-साफ बता नहीं रहा है इसलिए मैं इससे ज्यादा  कुछ नहीं जनता कोए ने उत्तर दिया।

कोए और कछुए के पूछने पर हिरण्यक { चूहे }  ने अपनी कहानी इस तरह सुनाई।

दक्षिण देश में महिलारुप्य नामक एक नगर है ,वहाँ पर एक बहुत बड़ा शिवालय है ,शिवालय के समीप में एक मठ है ,उस मठ के एक कमरे में चूड़ाकर्ण नामक एक सन्यासी रहता था ,वह प्रतिदिन भिछा पात्र लेकर ,नगर में भिछा मांगता था  उस नगर में अनेक धनि थे ,जिस कारन उसे चीनी और गुड से बनी मिठाईया दाड़िम ,आम जैसे अच्छे -2 फल भी  मिल जाते थे ,उनमे से वह थोड़ा सा भाग खाकर बाकि हिस्सा भिच्छा पात्र में ही दीवर पर टांग दिया करता था। रात के वक़्त में तथा मेरे अनुचर भिच्छा पात्र में कूद पड़ते और स्वादिष्ट पदार्थ खाया करते थे।

उन्ही दिनों में बृहस्पति नामक सन्यासी का मित्र उसे देखने आया वह बड़ा  ताजा और उसका पेट भारी था  सन्यासी चूड़ाकर्ण ने बृहस्पति से पूछा मित्रवर आज तुम कहा-२ भ्रमण करते थे क्या-२ देखा है।, तो सही बहुत समय  पूर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुष्कर तीर्थ में हम दोनों ने स्नान किया था शायद तुम्हे याद होगा उस भीड़ में हम दोनों एक दूसरे से अलग हो गए ,फिर मिल न पाये इसके बाद मैंने हरिद्धार ,प्रयाग ,काशी इत्यादि तीर्थो की यात्रा करके  अनेक विचित्र देखे इन शब्दों के साथ बृहस्पति तीर्थो को विशेषताए बता रहा था  मैं भिच्छापात्र में प्रवेश करके वे पदार्थ  लगा तब   सन्यासी ने मुझे डराने  के लिए बिच्छापात्र में अपनी लाठी  प्रहार किया।

इसे देख बृहस्पति खींचकर बोला यह क्या है तुम तीर्थ  विशेषतायें सुनने की इच्छा प्रकट करने लाठी से इस प्रकार आवाज क्यों करते हो क्या तुम्हारी सुनने की इच्छा नहीं है ,इस पर चूड़ाकर्ण ने कहा मित्रवर नाराज मत हो  , एक चूहा अपने अनुचरों साथ भिच्छा पात्र में प्रवेश करने मेरे छिपाए गए पदार्थो को खा रहा है ,

यहाँ पर एक ही  चूहा है या  अनेक …. बृहस्पति ने पूछा

अनेक चूहे है ,पर मैं उनपर विशेष धयान नहीं देता यह तो उनका सरदार है ,यह  बिलकुल परवाह नहीं करती चूड़ाकर्ण ने उत्तर दिया।

उसके इस साहस  का  जबरदस्त कारण होगा। बहुत समय पूर्व एक ब्रहमाणी ने तिल की दाल के बदले कच्चा तिल  ले लिया ,तो इसका एक   कारण यह भी तो है बृहस्पति ने कहा “वह कैसी कहानी है?” चूड़ाकर्ण ने पूछा ,इस पर बृहस्पति ने यूँ सुनायई :-

*तिल के दाल के बदले कच्चा तिल *

एक बार वर्षा  ऋतु में मैंने एक नगर के ब्रह्मण से निवेदन किया की वर्षा ऋतू के समाप्त  होने तक मुझे उनके घर में रहने दिया जाये ब्रह्मण ने मान लिया ,एक दिन उस ब्रह्मण  अपनी पत्नी से कहा कल दक्षिणायण का पुण्यकाल प्रारम्भ होने जा रहा है उस संक्रमण उस समय ब्रह्मणो को बुलाकर दावत देंगे

इस पर ब्रह्मणि नाराज होकर बोली हमें खुद खाने को नहीं ,ऐसी हालत में हम अन्य ब्रह्मणो  को कहा से खिलायेंगे ?

ऐसा मत कहो गरीबो  अपनी शक्ति भर योग्य व्यक्तियों  खिलाना होगा , किफायत करना  है ,पर लालच ठीक नहीं है। … इसी  लालच में पड़कर एक सियार ने अपने प्राण गवा दिए। …ब्रह्मण ने कहा।

वह कैसी कहानी है ? ब्रह्मणि  ने पूछा , उसकी पत्नी ने वह कहानी यो सुनाई

                                                *प्रलोभन वाला सियार *

एक दिन  प्रात:काल एक सियार ने जंगल में एक जंगली सूअर को अपने बाण से मारा बाण खाकर  सुवर नहीं मरा उसने शिकारी पर हमला करके उसके पेट को चीर डाला शिकारी मर गया , कुछ  छनो में सूअर भी मर गया,इसके थोड़ी देर बाद उधर से एक सियार आ निकला उसने मन से सोचा वाह मेरी किस्मत भी कैसी प्रबल  है इन लाशो को मैं कई दिनों तक खा सकता हुँ ,इस वक़्त धनुष के चमड़े को खा डालु तो मेरा पूरा पेट भर जायेगा , सियार ने धनुष को उठाकर चमड़े को कुतर-२ खाते हुए मन में कहा जहाँ तक हो सके थोड़ा खाना चाहिए लेकिन ,ज्यो हो उसने चमड़ा को काटा त्यों ही धनुष सियार के मुँह में से निकलकर सर  गया वह वही पर मर गया

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